Shree Ramcharitmans- Balkand 44- Flower garden-inspection, first darshan of Sitaji, mutual darshan of Shri Sita-Ramji

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दोहा:

*उठे लखनु निसि बिगत सुनि अरुनसिखा धुनि कान।
गुर तें पहिलेहिं जगतपति जागे रामु सुजान॥226॥

भावार्थ:-रात बीतने पर, मुर्गे का शब्द कानों से सुनकर लक्ष्मणजी उठे। जगत के स्वामी सुजान श्री रामचन्द्रजी भी गुरु से पहले ही जाग गए॥226॥

Meaning :- At the end of the night, Laxman ji woke up after hearing the sound of the cock. Lord of the world Sujan Shri Ramchandraji also woke up before the Guru ॥226॥

चौपाई:

*सकल सौच करि जाइ नहाए। नित्य निबाहि मुनिहि सिर नाए॥
समय जानि गुर आयसु पाई। लेन प्रसून चले दोउ भाई॥1॥

भावार्थ:-सब शौचक्रिया करके वे जाकर नहाए। फिर (संध्या-अग्निहोत्रादि) नित्यकर्म समाप्त करके उन्होंने मुनि को मस्तक नवाया। (पूजा का) समय जानकर, गुरु की आज्ञा पाकर दोनों भाई फूल लेने चले॥1॥

Meaning :- After doing all the defecation, they went and took a bath. Then after finishing the routine (Sandhya-Agnihotradi) he made the sage bow his head. Knowing the time (of worship), both the brothers went to collect flowers after getting the order of the Guru ॥1॥

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*भूप बागु बर देखेउ जाई। जहँ बसंत रितु रही लोभाई॥
लागे बिटप मनोहर नाना। बरन बरन बर बेलि बिताना॥2॥

भावार्थ:-उन्होंने जाकर राजा का सुंदर बाग देखा, जहाँ वसंत ऋतु लुभाकर रह गई है। मन को लुभाने वाले अनेक वृक्ष लगे हैं। रंग-बिरंगी उत्तम लताओं के मंडप छाए हुए हैं॥2॥

Meaning :- He went and saw the beautiful garden of the king, where the spring season has been tempting. There are many trees that entice the mind. The pavilions of colorful exquisite vines are covered ॥2॥


*नव पल्लव फल सुमन सुहाए। निज संपति सुर रूख लजाए॥
चातक कोकिल कीर चकोरा। कूजत बिहग नटत कल मोरा॥3॥

भावार्थ:-नए, पत्तों, फलों और फूलों से युक्त सुंदर वृक्ष अपनी सम्पत्ति से कल्पवृक्ष को भी लजा रहे हैं। पपीहे, कोयल, तोते, चकोर आदि पक्षी मीठी बोली बोल रहे हैं और मोर सुंदर नृत्य कर रहे हैं॥3॥

Meaning :- Beautiful trees with new, leaves, fruits and flowers are putting even Kalpavriksha to shame with their wealth. Birds like papihe, cuckoo, parrot, chakor etc. are speaking sweetly and peacocks are dancing beautifully ॥3॥

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*मध्य बाग सरु सोह सुहावा। मनि सोपान बिचित्र बनावा॥
बिमल सलिलु सरसिज बहुरंगा। जलखग कूजत गुंजत भृंगा॥4॥

भावार्थ:-बाग के बीचोंबीच सुहावना सरोवर सुशोभित है, जिसमें मणियों की सीढ़ियाँ विचित्र ढंग से बनी हैं। उसका जल निर्मल है, जिसमें अनेक रंगों के कमल खिले हुए हैं, जल के पक्षी कलरव कर रहे हैं और भ्रमर गुंजार कर रहे हैं॥4॥

Meaning :- In the middle of the garden, there is a beautiful lake, in which the stairs of gems are made in a strange way. Its water is pure, in which lotuses of many colors are blooming, water birds are chirping and illusions are humming ॥4॥

दोहा:

*बागु तड़ागु बिलोकि प्रभु हरषे बंधु समेत।
परम रम्य आरामु यहु जो रामहि सुख देत॥227॥

भावार्थ:-बाग और सरोवर को देखकर प्रभु श्री रामचन्द्रजी भाई लक्ष्मण सहित हर्षित हुए। यह बाग (वास्तव में) परम रमणीय है, जो (जगत को सुख देने वाले) श्री रामचन्द्रजी को सुख दे रहा है॥227॥

Meaning :- Prabhu Shri Ramchandraji along with brother Laxman was overjoyed to see the garden and the lake. This garden is (actually) very delightful, which is giving happiness to Shri Ramchandraji (the giver of happiness to the world) ॥227॥

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चौपाई:
*चहुँ दिसि चितइ पूँछि मालीगन। लगे लेन दल फूल मुदित मन॥
तेहि अवसर सीता तहँ आई। गिरिजा पूजन जननि पठाई॥1॥

भावार्थ:-चारों ओर दृष्टि डालकर और मालियों से पूछकर वे प्रसन्न मन से पत्र-पुष्प लेने लगे। उसी समय सीताजी वहाँ आईं। माता ने उन्हें गिरिजाजी (पार्वती) की पूजा करने के लिए भेजा था॥1॥

Meaning :- By looking around and asking the gardeners, they started taking leaves and flowers with a happy heart. At the same time Sitaji came there. Mother had sent him to worship Girijaji (Parvati) ॥1॥

*संग सखीं सब सुभग सयानीं। गावहिं गीत मनोहर बानीं॥
सर समीप गिरिजा गृह सोहा। बरनि न जाइ देखि मनु मोहा॥2॥

भावार्थ:-साथ में सब सुंदरी और सयानी सखियाँ हैं, जो मनोहर वाणी से गीत गा रही हैं। सरोवर के पास गिरिजाजी का मंदिर सुशोभित है, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता, देखकर मन मोहित हो जाता है॥।2॥

Meaning :- Together there are all beautiful and wise friends, who are singing songs with lovely voice. Girijaji’s temple near the lake is beautiful, which cannot be described, the mind gets fascinated by seeing it ॥.2॥

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*मज्जनु करि सर सखिन्ह समेता। गई मुदित मन गौरि निकेता॥
पूजा कीन्हि अधिक अनुरागा। निज अनुरूप सुभग बरु मागा॥3॥

भावार्थ:-सखियों सहित सरोवर में स्नान करके सीताजी प्रसन्न मन से गिरिजाजी के मंदिर में गईं। उन्होंने बड़े प्रेम से पूजा की और अपने योग्य सुंदर वर माँगा॥3॥

Meaning :- After bathing in the lake along with her friends, Sitaji went to Girijaji’s temple with a happy heart. He worshiped with great love and asked for a handsome groom worthy of him ॥3॥

*एक सखी सिय संगु बिहाई। गई रही देखन फुलवाई॥
तेहिं दोउ बंधु बिलोके जाई। प्रेम बिबस सीता पहिं आई॥4॥

भावार्थ:-एक सखी सीताजी का साथ छोड़कर फुलवाड़ी देखने चली गई थी। उसने जाकर दोनों भाइयों को देखा और प्रेम में विह्वल होकर वह सीताजी के पास आई॥4॥

Meaning :- A friend left Sitaji’s company and went to see Phulwadi. She went and saw both the brothers and she came to Sitaji being overwhelmed with love ॥4॥

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दोहा:

*तासु दसा देखी सखिन्ह पुलक गात जलु नैन।
कहु कारनु निज हरष कर पूछहिं सब मृदु बैन॥228॥

भावार्थ:-सखियों ने उसकी दशा देखी कि उसका शरीर पुलकित है और नेत्रों में जल भरा है। सब कोमल वाणी से पूछने लगीं कि अपनी प्रसन्नता का कारण बता॥228॥

Meaning :- The friends saw her condition that her body was ecstatic and her eyes were filled with water. Everyone started asking in a soft voice that tell the reason for your happiness ॥228॥

चौपाई:

*देखन बागु कुअँर दुइ आए। बय किसोर सब भाँति सुहाए॥
स्याम गौर किमि कहौं बखानी। गिरा अनयन नयन बिनु बानी॥1॥

भावार्थ:-(उसने कहा-) दो राजकुमार बाग देखने आए हैं। किशोर अवस्था के हैं और सब प्रकार से सुंदर हैं। वे साँवले और गोरे (रंग के) हैं, उनके सौंदर्य को मैं कैसे बखानकर कहूँ। वाणी बिना नेत्र की है और नेत्रों के वाणी नहीं है॥1॥

Meaning :-(He said-) Two princes have come to see the garden. They are of adolescent age and are beautiful in every way. They are dark and fair (complexioned), how can I describe their beauty. Speech is without eyes and there is no speech of eyes ॥1॥

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*सुनि हरषीं सब सखीं सयानी। सिय हियँ अति उतकंठा जानी॥
एक कहइ नृपसुत तेइ आली। सुने जे मुनि सँग आए काली॥2॥

भावार्थ:-यह सुनकर और सीताजी के हृदय में बड़ी उत्कंठा जानकर सब सयानी सखियाँ प्रसन्न हुईं। तब एक सखी कहने लगी- हे सखी! ये वही राजकुमार हैं, जो सुना है कि कल विश्वामित्र मुनि के साथ आए हैं॥2॥

Meaning :- All the wise friends were happy after hearing this and knowing the great eagerness in Sitaji’s heart. Then a friend started saying – Hey friend! This is the same prince, who has heard that yesterday Vishwamitra has come with Muni ॥2॥

*जिन्ह निज रूप मोहनी डारी। कीन्हे स्वबस नगर नर नारी॥
बरनत छबि जहँ तहँ सब लोगू। अवसि देखिअहिं देखन जोगू॥3॥

भावार्थ:-और जिन्होंने अपने रूप की मोहिनी डालकर नगर के स्त्री-पुरुषों को अपने वश में कर लिया है। जहाँ-तहाँ सब लोग उन्हीं की छबि का वर्णन कर रहे हैं। अवश्य (चलकर) उन्हें देखना चाहिए, वे देखने ही योग्य हैं॥3॥

Meaning :- And who has taken the men and women of the city under his control by putting the charm of his form. Everywhere everyone is describing his image. Must (walking) see them, they are worth seeing ॥3॥

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*तासु बचन अति सियहि सोहाने। दरस लागि लोचन अकुलाने॥
चली अग्र करि प्रिय सखि सोई। प्रीति पुरातन लखइ न कोई॥4॥

भावार्थ:-उसके वचन सीताजी को अत्यन्त ही प्रिय लगे और दर्शन के लिए उनके नेत्र अकुला उठे। उसी प्यारी सखी को आगे करके सीताजी चलीं। पुरानी प्रीति को कोई लख नहीं पाता॥4॥

Meaning :- His words were very dear to Sitaji and her eyes widened for darshan. Sitaji went ahead with that lovely friend. No one can remember the old love ॥4॥

दोहा:

*सुमिरि सीय नारद बचन उपजी प्रीति पुनीत।
चकित बिलोकति सकल दिसि जनु सिसु मृगी सभीत॥229॥

भावार्थ:-नारदजी के वचनों का स्मरण करके सीताजी के मन में पवित्र प्रीति उत्पन्न हुई। वे चकित होकर सब ओर इस तरह देख रही हैं, मानो डरी हुई मृगछौनी इधर-उधर देख रही हो॥229॥

Meaning :- By remembering the words of Naradji, pure love arose in Sitaji’s mind. Astonished, she is looking everywhere, as if a frightened fawn is looking here and there ॥229॥

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चौपाई:

*कंकन किंकिनि नूपुर धुनि सुनि। कहत लखन सन रामु हृदयँ गुनि॥
मानहुँ मदन दुंदुभी दीन्ही। मनसा बिस्व बिजय कहँ कीन्ही॥1॥

भावार्थ:-कंकण (हाथों के कड़े), करधनी और पायजेब के शब्द सुनकर श्री रामचन्द्रजी हृदय में विचार कर लक्ष्मण से कहते हैं- (यह ध्वनि ऐसी आ रही है) मानो कामदेव ने विश्व को जीतने का संकल्प करके डंके पर चोट मारी है॥1॥

Meaning :- Hearing the words of bracelets, girdle and anklets, Shri Ramchandraji thinks in his heart and says to Lakshman – (This sound is coming like this) as if Kamdev has hit the sting with a resolve to conquer the world. 1॥

*अस कहि फिरि चितए तेहि ओरा। सिय मुख ससि भए नयन चकोरा॥
भए बिलोचन चारु अचंचल। मनहुँ सकुचि निमि तजे दिगंचल॥2॥

भावार्थ:-ऐसा कहकर श्री रामजी ने फिर कर उस ओर देखा। श्री सीताजी के मुख रूपी चन्द्रमा (को निहारने) के लिए उनके नेत्र चकोर बन गए। सुंदर नेत्र स्थिर हो गए (टकटकी लग गई)। मानो निमि (जनकजी के पूर्वज) ने (जिनका सबकी पलकों में निवास माना गया है, लड़की-दामाद के मिलन-प्रसंग को देखना उचित नहीं, इस भाव से) सकुचाकर पलकें छोड़ दीं, (पलकों में रहना छोड़ दिया, जिससे पलकों का गिरना रुक गया)॥2॥

Meaning :- By saying this, Shri Ramji turned and looked at that side. His eyes became square to look at the moon in the form of Shri Sitaji’s face. Beautiful eyes became fixed (gaze). As if Nimi (ancestor of Janakji) (who is believed to reside in everyone’s eyelids, it is not appropriate to see the union of the girl-son-in-law, in this sense) left the eyelids, (stopped living in the eyelids, due to which the eyelids fall) stopped) ॥2॥

*देखि सीय शोभा सुखु पावा। हृदयँ सराहत बचनु न आवा॥
जनु बिरंचि सब निज निपुनाई। बिरचि बिस्व कहँ प्रगटि देखाई॥3॥

भावार्थ:-सीताजी की शोभा देखकर श्री रामजी ने बड़ा सुख पाया। हृदय में वे उसकी सराहना करते हैं, किन्तु मुख से वचन नहीं निकलते। (वह शोभा ऐसी अनुपम है) मानो ब्रह्मा ने अपनी सारी निपुणता को मूर्तिमान कर संसार को प्रकट करके दिखा दिया हो॥3॥

Meaning :- Seeing the beauty of Sitaji, Shri Ramji felt great happiness. They appreciate him in the heart, but words do not come out of the mouth. (That beauty is so unique) as if Brahma has shown all his skill by manifesting it to the world ॥3॥

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*सुंदरता कहुँ सुंदर करई। छबिगृहँ दीपसिखा जनु बरई॥
सब उपमा कबि रहे जुठारी। केहिं पटतरौं बिदेहकुमारी॥4॥

भावार्थ:-वह (सीताजी की शोभा) सुंदरता को भी सुंदर करने वाली है। (वह ऐसी मालूम होती है) मानो सुंदरता रूपी घर में दीपक की लौ जल रही हो। (अब तक सुंदरता रूपी भवन में अँधेरा था, वह भवन मानो सीताजी की सुंदरता रूपी दीपशिखा को पाकर जगमगा उठा है, पहले से भी अधिक सुंदर हो गया है)। सारी उपमाओं को तो कवियों ने जूँठा कर रखा है। मैं जनकनन्दिनी श्री सीताजी की किससे उपमा दूँ॥4॥

Meaning :- She (Sitaji’s beauty) is going to beautify even beauty. (She appears like this) as if the flame of a lamp is burning in the house of beauty. (Till now there was darkness in the building of beauty, as if it has become more beautiful than before after getting the lamp of Sitaji’s beauty). The poets have made all the similes false. With whom should I compare Janakandini Shri Sitaji ॥4॥

दोहा:

*सिय शोभा हियँ बरनि प्रभु आपनि दसा बिचारि॥
बोले सुचि मन अनुज सन बचन समय अनुहारि॥230॥

भावार्थ:-(इस प्रकार) हृदय में सीताजी की शोभा का वर्णन करके और अपनी दशा को विचारकर प्रभु श्री रामचन्द्रजी पवित्र मन से अपने छोटे भाई लक्ष्मण से समयानुकूल वचन बोले-॥230॥

Meaning :-(In this way) Lord Shri Ramchandraji spoke timely words to his younger brother Lakshmana with a pure heart after describing the beauty of Sitaji in the heart and thinking about his condition – ॥230॥

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चौपाई:

*तात जनकतनया यह सोई। धनुषजग्य जेहि कारन होई॥
पूजन गौरि सखीं लै आईं। करत प्रकासु फिरइ फुलवाईं॥1॥

भावार्थ:-हे तात! यह वही जनकजी की कन्या है, जिसके लिए धनुषयज्ञ हो रहा है। सखियाँ इसे गौरी पूजन के लिए ले आई हैं। यह फुलवाड़ी में प्रकाश करती हुई फिर रही है॥1॥

Meaning :- Hey Tat! This is the same Janakji’s daughter, for whom Dhanushyagya is being performed. Friends have brought it for Gauri Pujan. It is roaming in the flower garden giving light ॥1॥

*जासु बिलोकि अलौकिक सोभा। सहज पुनीत मोर मनु छोभा॥
सो सबु कारन जान बिधाता। फरकहिं सुभद अंग सुनु भ्राता॥2॥

भावार्थ:-जिसकी अलौकिक सुंदरता देखकर स्वभाव से ही पवित्र मेरा मन क्षुब्ध हो गया है। वह सब कारण (अथवा उसका सब कारण) तो विधाता जानें, किन्तु हे भाई! सुनो, मेरे मंगलदायक (दाहिने) अंग फड़क रहे हैं॥2॥

Meaning :- Seeing whose supernatural beauty my mind, which is pure by nature, has become agitated. All those reasons (or all its reasons) should be known by the creator, but hey brother! Listen, my auspicious (right) organs are fluttering ॥2॥

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*रघुबंसिन्ह कर सहज सुभाऊ। मनु कुपंथ पगु धरइ न काऊ॥
मोहि अतिसय प्रतीति मन केरी। जेहिं सपनेहुँ परनारि न हेरी॥3॥

भावार्थ:-रघुवंशियों का यह सहज (जन्मगत) स्वभाव है कि उनका मन कभी कुमार्ग पर पैर नहीं रखता। मुझे तो अपने मन का अत्यन्त ही विश्वास है कि जिसने (जाग्रत की कौन कहे) स्वप्न में भी पराई स्त्री पर दृष्टि नहीं डाली है॥3॥

Meaning :- It is the natural (inborn) nature of Raghuvanshis that their mind never sets foot on the wrong path. I have a lot of faith in my mind that the one who (who can say in the waking state) has never looked at a stranger’s woman even in his dreams ॥3॥

*जिन्ह कै लहहिं न रिपु रन पीठी। नहिं पावहिं परतिय मनु डीठी॥
मंगन लहहिं न जिन्ह कै नाहीं। ते नरबर थोरे जग माहीं॥4॥

भावार्थ:-रण में शत्रु जिनकी पीठ नहीं देख पाते (अर्थात्‌ जो लड़ाई के मैदान से भागते नहीं), पराई स्त्रियाँ जिनके मन और दृष्टि को नहीं खींच पातीं और भिखारी जिनके यहाँ से ‘नाहीं’ नहीं पाते (खाली हाथ नहीं लौटते), ऐसे श्रेष्ठ पुरुष संसार में थोड़े हैं॥4॥

Meaning :- Those whose backs are not seen by the enemies in the battle (i.e. those who do not run away from the battle field), foreign women whose mind and vision are not attracted and beggars from whose place they do not get ‘no’ (do not return empty-handed), such The best men are few in the world ॥4॥

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दोहा:

*करत बतकही अनुज सन मन सिय रूप लोभान।
मुख सरोज मकरंद छबि करइ मधुप इव पान॥231॥

भावार्थ:- यों श्री रामजी छोटे भाई से बातें कर रहे हैं, पर मन सीताजी के रूप में लुभाया हुआ उनके मुखरूपी कमल के छबि रूप मकरंद रस को भौंरे की तरह पी रहा है॥231॥

Meaning :- Thus Shri Ramji is talking to his younger brother, but the mind, enticed in the form of Sitaji, is drinking nectar like a bumblebee in the form of her lotus face.

चौपाई:

*चितवति चकित चहूँ दिसि सीता। कहँ गए नृप किसोर मनु चिंता॥
जहँ बिलोक मृग सावक नैनी। जनु तहँ बरिस कमल सित श्रेनी॥1॥

भावार्थ:-सीताजी चकित होकर चारों ओर देख रही हैं। मन इस बात की चिन्ता कर रहा है कि राजकुमार कहाँ चले गए। बाल मृगनयनी (मृग के छौने की सी आँख वाली) सीताजी जहाँ दृष्टि डालती हैं, वहाँ मानो श्वेत कमलों की कतार बरस जाती है॥1॥

Meaning :- Sitaji is looking around in astonishment. The mind is worrying about where the prince has gone. Wherever Sita ji, who has eyes like the touch of an antelope, looks like a row of white lotuses there ॥1॥

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*लता ओट तब सखिन्ह लखाए। स्यामल गौर किसोर सुहाए॥
देखि रूप लोचन ललचाने। हरषे जनु निज निधि पहिचाने॥2॥

भावार्थ:-तब सखियों ने लता की ओट में सुंदर श्याम और गौर कुमारों को दिखलाया। उनके रूप को देखकर नेत्र ललचा उठे, वे ऐसे प्रसन्न हुए मानो उन्होंने अपना खजाना पहचान लिया॥2॥

Meaning :- Then the friends showed the beautiful Shyam and Gaur Kumars in the cloak of Lata. Eyes were tempted to see his form, they were so happy as if they recognized their treasure ॥2॥

*थके नयन रघुपति छबि देखें। पलकन्हिहूँ परिहरीं निमेषें॥
अधिक सनेहँ देह भै भोरी। सरद ससिहि जनु चितव चकोरी॥3॥

भावार्थ:-श्री रघुनाथजी की छबि देखकर नेत्र थकित (निश्चल) हो गए। पलकों ने भी गिरना छोड़ दिया। अधिक स्नेह के कारण शरीर विह्वल (बेकाबू) हो गया। मानो शरद ऋतु के चन्द्रमा को चकोरी (बेसुध हुई) देख रही हो॥3॥

Meaning :- The eyes became tired (restless) after seeing the image of Shri Raghunathji. The eyelashes also stopped falling. Due to excessive affection, the body became restless (uncontrollable). As if Chakori (fell unconscious) is looking at the autumn moon ॥3॥

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*लोचन मग रामहि उर आनी। दीन्हे पलक कपाट सयानी॥
जब सिय सखिन्ह प्रेमबस जानी। कहि न सकहिं कछु मन सकुचानी॥4॥

भावार्थ:-नेत्रों के रास्ते श्री रामजी को हृदय में लाकर चतुरशिरोमणि जानकीजी ने पलकों के किवाड़ लगा दिए (अर्थात नेत्र मूँदकर उनका ध्यान करने लगीं)। जब सखियों ने सीताजी को प्रेम के वश जाना, तब वे मन में सकुचा गईं, कुछ कह नहीं सकती थीं॥4॥

Meaning :- Chaturshiromani Janaki ji closed the doors of the eyelids by bringing Shri Ramji in her heart through the eyes (i.e. she closed her eyes and started meditating on him). When the friends came to know Sitaji under the control of love, then she was shy in her mind, could not say anything ॥4॥

दोहा:

*लताभवन तें प्रगट भे तेहि अवसर दोउ भाइ।
तकिसे जनु जुग बिमल बिधु जलद पटल बिलगाई॥232॥

भावार्थ:-उसी समय दोनों भाई लता मंडप (कुंज) में से प्रकट हुए। मानो दो निर्मल चन्द्रमा बादलों के परदे को हटाकर निकले हों॥232॥

Meaning :- At the same time both the brothers appeared from Lata Mandap (Kunj). As if two pure moons have come out after removing the veil of clouds ॥232॥

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चौपाई:

*सोभा सीवँ सुभग दोउ बीरा। नील पीत जलजाभ सरीरा॥
मोरपंख सिर सोहत नीके। गुच्छ बीच बिच कुसुम कली के॥1॥

भावार्थ:-दोनों सुंदर भाई शोभा की सीमा हैं। उनके शरीर की आभा नीले और पीले कमल की सी है। सिर पर सुंदर मोरपंख सुशोभित हैं। उनके बीच-बीच में फूलों की कलियों के गुच्छे लगे हैं॥1॥

Meaning :- Both beautiful brothers are the limit of beauty. The aura of His body is like that of a blue and yellow lotus. Beautiful peacock feathers are adorned on the head. There are bunches of flower buds in between them ॥1॥

*भाल तिलक श्रम बिन्दु सुहाए। श्रवन सुभग भूषन छबि छाए॥
बिकट भृकुटि कच घूघरवारे। नव सरोज लोचन रतनारे॥2॥

भावार्थ:-माथे पर तिलक और पसीने की बूँदें शोभायमान हैं। कानों में सुंदर भूषणों की छबि छाई है। टेढ़ी भौंहें और घुँघराले बाल हैं। नए लाल कमल के समान रतनारे (लाल) नेत्र हैं॥2॥

Meaning :- Tilak and drops of sweat on the forehead are beautiful. There is an image of beautiful ornaments in the ears. Has crooked eyebrows and curly hair. Ratnare (red) eyes are like new red lotus ॥2॥

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*चारु चिबुक नासिका कपोला। हास बिलास लेत मनु मोला॥
मुखछबि कहि न जाइ मोहि पाहीं। जो बिलोकि बहु काम लजाहीं॥3॥

भावार्थ:-ठोड़ी नाक और गाल बड़े सुंदर हैं और हँसी की शोभा मन को मोल लिए लेती है। मुख की छबि तो मुझसे कही ही नहीं जाती, जिसे देखकर बहुत से कामदेव लजा जाते हैं॥3॥

Meaning :- Chin nose and cheeks are very beautiful and the beauty of laughter buys the mind. The image of the face does not go away from me, seeing which many cupids are ashamed ॥3॥

*उर मनि माल कंबु कल गीवा। काम कलभ कर भुज बलसींवा॥
सुमन समेत बाम कर दोना। सावँर कुअँर सखी सुठि लोना॥4॥

भावार्थ:-वक्षःस्थल पर मणियों की माला है। शंख के सदृश सुंदर गला है। कामदेव के हाथी के बच्चे की सूँड के समान (उतार-चढ़ाव वाली एवं कोमल) भुजाएँ हैं, जो बल की सीमा हैं। जिसके बाएँ हाथ में फूलों सहित दोना है, हे सखि! वह साँवला कुँअर तो बहुत ही सलोना है॥4॥

Meaning :- There is a garland of gems on the chest. The throat is beautiful like a conch shell. Kamadeva’s baby elephant has arms (fluctuating and soft) like the trunk, which are the limit of strength. Who has a dona with flowers in his left hand, O friend! That dark virgin is very beautiful ॥4॥

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दोहा:

*केहरि कटि पट पीत धर सुषमा सील निधान।
देखि भानुकुलभूषनहि बिसरा सखिन्ह अपान॥233॥

भावार्थ:-सिंह की सी (पतली, लचीली) कमर वाले, पीताम्बर धारण किए हुए, शोभा और शील के भंडार, सूर्यकुल के भूषण श्री रामचन्द्रजी को देखकर सखियाँ अपने आपको भूल गईं॥233॥

Meaning :- The friends forgot themselves after seeing the lion’s (thin, flexible) waist, wearing pitambar, the storehouse of beauty and modesty, the jewel of Suryakul Shri Ramchandraji ॥233॥

चौपाई:

*धरि धीरजु एक आलि सयानी। सीता सन बोली गहि पानी॥
बहुरि गौरि कर ध्यान करेहू। भूपकिसोर देखि किन लेहू॥1॥

भावार्थ:-एक चतुर सखी धीरज धरकर, हाथ पकड़कर सीताजी से बोली- गिरिजाजी का ध्यान फिर कर लेना, इस समय राजकुमार को क्यों नहीं देख लेतीं॥1॥

Meaning :- A clever friend patiently held her hand and said to Sitaji – Return the attention of Girijaji, why don’t you see the prince at this time ॥1॥

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*सकुचि सीयँ तब नयन उघारे। सनमुख दोउ रघुसिंघ निहारे॥
नख सिख देखि राम कै सोभा। सुमिरि पिता पनु मनु अति छोभा॥2॥

भावार्थ:-तब सीताजी ने सकुचाकर नेत्र खोले और रघुकुल के दोनों सिंहों को अपने सामने (खड़े) देखा। नख से शिखा तक श्री रामजी की शोभा देखकर और फिर पिता का प्रण याद करके उनका मन बहुत क्षुब्ध हो गया॥2॥

Meaning :- Then Sitaji opened her eyes and saw both the lions of Raghukul (standing) in front of her. Seeing Shri Ramji’s beauty from nail to tip and then remembering his father’s vow, his mind became very upset.॥2॥

*परबस सखिन्ह लखी जब सीता। भयउ गहरु सब कहहिं सभीता॥
पुनि आउब एहि बेरिआँ काली। अस कहि मन बिहसी एक आली॥3॥

भावार्थ:-जब सखियों ने सीताजी को परवश (प्रेम के वश) देखा, तब सब भयभीत होकर कहने लगीं- बड़ी देर हो गई। (अब चलना चाहिए)। कल इसी समय फिर आएँगी, ऐसा कहकर एक सखी मन में हँसी॥3॥

Meaning :- When the friends saw Sitaji under love (under the control of love), then everyone started saying in fear – it is too late. (must run now). A friend laughed in her heart by saying that she will come again at this time tomorrow ॥3॥

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*गूढ़ गिरा सुनि सिय सकुचानी। भयउ बिलंबु मातु भय मानी॥
धरि बड़ि धीर रामु उर आने। फिरी अपनपउ पितुबस जाने॥4॥

भावार्थ:-सखी की यह रहस्यभरी वाणी सुनकर सीताजी सकुचा गईं। देर हो गई जान उन्हें माता का भय लगा। बहुत धीरज धरकर वे श्री रामचन्द्रजी को हृदय में ले आईं और (उनका ध्यान करती हुई) अपने को पिता के अधीन जानकर लौट चलीं॥4॥

Meaning :- Sitaji shuddered after hearing this mysterious speech of her friend. It was too late, he was afraid of his mother. With a lot of patience, she brought Shri Ramchandraji to her heart and (while meditating on him) returned knowing that she was under her father ॥4॥

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