Shree Ramcharitmans- Balkand 46- Vishwamitra’s entry into the sacrificial fire along with Shri Ram-Laxman

Advertisements
Advertisements

चौपाई:

*सीय स्वयंबरू देखिअ जाई। ईसु काहि धौं देइ बड़ाई॥
लखन कहा जस भाजनु सोई। नाथ कृपा तव जापर होई॥1॥

भावार्थ:-चलकर सीताजी के स्वयंवर को देखना चाहिए। देखें ईश्वर किसको बड़ाई देते हैं। लक्ष्मणजी ने कहा- हे नाथ! जिस पर आपकी कृपा होगी, वही बड़ाई का पात्र होगा (धनुष तोड़ने का श्रेय उसी को प्राप्त होगा)॥1॥

Meaning :- Let’s go and see Sitaji’s Swayamvar. See whom God praises. Laxmanji said – O Nath! The one on whom you will be kind, he will be praised (he will get the credit for breaking the bow) ॥1॥

Advertisements

*हरषे मुनि सब सुनि बर बानी। दीन्हि असीस सबहिं सुखु मानी॥
पुनि मुनिबृंद समेत कृपाला। देखन चले धनुषमख साला॥2॥

भावार्थ:-इस श्रेष्ठ वाणी को सुनकर सब मुनि प्रसन्न हुए। सभी ने सुख मानकर आशीर्वाद दिया। फिर मुनियों के समूह सहित कृपालु श्री रामचन्द्रजी धनुष यज्ञशाला देखने चले॥2॥

Meaning :- All the sages were happy after listening to this great speech. Everyone gave blessings considering it as happiness. Then the gracious Shri Ramchandraji went to see the Dhanush Yagyashala with a group of sages.॥2॥

*रंगभूमि आए दोउ भाई। असि सुधि सब पुरबासिन्ह पाई॥
चले सकल गृह काज बिसारी। बाल जुबान जरठ नर नारी॥3॥

भावार्थ:-दोनों भाई रंगभूमि में आए हैं, ऐसी खबर जब सब नगर निवासियों ने पाई, तब बालक, जवान, बूढ़े, स्त्री, पुरुष सभी घर और काम-काज को भुलाकर चल दिए॥3॥

Meaning :- Both the brothers have come to the theater, when all the residents of the city got such news, then children, youth, old men, women, men all went away forgetting their homes and work ॥3॥

Advertisements

*देखी जनक भीर भै भारी। सुचि सेवक सब लिए हँकारी॥
तुरत सकल लोगन्ह पहिं जाहू। आसन उचित देहु सब काहू॥4॥

भावार्थ:-जब जनकजी ने देखा कि बड़ी भीड़ हो गई है, तब उन्होंने सब विश्वासपात्र सेवकों को बुलवा लिया और कहा- तुम लोग तुरंत सब लोगों के पास जाओ और सब किसी को यथायोग्य आसन दो॥4॥

Meaning :- When Janakji saw that there was a big crowd, then he called all the trusted servants and said – You people immediately go to all the people and give everyone a proper seat ॥4॥

दोहा:

*कहि मृदु बचन बिनीत तिन्ह बैठारे नर नारि।
उत्तम मध्यम नीच लघु निज निज थल अनुहारि॥240॥

भावार्थ:-उन सेवकों ने कोमल और नम्र वचन कहकर उत्तम, मध्यम, नीच और लघु (सभी श्रेणी के) स्त्री-पुरुषों को अपने-अपने योग्य स्थान पर बैठाया॥240॥

Meaning :- By saying soft and gentle words, those servants made the best, medium, low and small (all categories) men and women sit at their respective places ॥240॥

Advertisements

चौपाई:

*राजकुअँर तेहि अवसर आए। मनहुँ मनोहरता तन छाए॥
गुन सागर नागर बर बीरा। सुंदर स्यामल गौर सरीरा॥1॥

भावार्थ:-उसी समय राजकुमार (राम और लक्ष्मण) वहाँ आए। (वे ऐसे सुंदर हैं) मानो साक्षात मनोहरता ही उनके शरीरों पर छा रही हो। सुंदर साँवला और गोरा उनका शरीर है। वे गुणों के समुद्र, चतुर और उत्तम वीर हैं॥1॥

Meaning :- At the same time the princes (Ram and Laxman) came there. (They are so beautiful) It is as if the beauty itself is enveloping their bodies. His body is beautiful dark and fair. He is an ocean of virtues, clever and the best of heroes ॥1॥

*राज समाज बिराजत रूरे। उडगन महुँ जनु जुग बिधु पूरे॥
जिन्ह कें रही भावना जैसी। प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी॥2॥

भावार्थ:-वे राजाओं के समाज में ऐसे सुशोभित हो रहे हैं, मानो तारागणों के बीच दो पूर्ण चन्द्रमा हों। जिनकी जैसी भावना थी, प्रभु की मूर्ति उन्होंने वैसी ही देखी॥2॥

Meaning :- They are being adorned in the society of kings, as if there are two full moons among the stars. Those who had feelings, saw the idol of the Lord in the same way ॥2॥

Advertisements

*देखहिं रूप महा रनधीरा। मनहुँ बीर रसु धरें सरीरा॥
डरे कुटिल नृप प्रभुहि निहारी। मनहुँ भयानक मूरति भारी॥3॥

भावार्थ:-महान रणधीर (राजा लोग) श्री रामचन्द्रजी के रूप को ऐसा देख रहे हैं, मानो स्वयं वीर रस शरीर धारण किए हुए हों। कुटिल राजा प्रभु को देखकर डर गए, मानो बड़ी भयानक मूर्ति हो॥3॥

Meaning :- Great Randhir (kings) are looking at the form of Shri Ramchandraji as if he himself is wearing a heroic body. The crooked king got scared seeing the Lord, as if he was a very terrible idol ॥3॥

*रहे असुर छल छोनिप बेषा। तिन्ह प्रभु प्रगट कालसम देखा।
पुरबासिन्ह देखे दोउ भाई। नरभूषन लोचन सुखदाई॥4॥

भावार्थ:-छल से जो राक्षस वहाँ राजाओं के वेष में (बैठे) थे, उन्होंने प्रभु को प्रत्यक्ष काल के समान देखा। नगर निवासियों ने दोनों भाइयों को मनुष्यों के भूषण रूप और नेत्रों को सुख देने वाला देखा॥4॥

Meaning :- The demons who were deceitfully (sitting) there in the guise of kings, saw the Lord as a real time. The residents of the city saw both the brothers as the beauty of humans and pleasing to the eyes ॥4॥

Advertisements

दोहा:

*नारि बिलोकहिं हरषि हियँ निज-निज रुचि अनुरूप।
जनु सोहत सिंगार धरि मूरति परम अनूप॥241॥

भावार्थ:-स्त्रियाँ हृदय में हर्षित होकर अपनी-अपनी रुचि के अनुसार उन्हें देख रही हैं। मानो श्रृंगार रस ही परम अनुपम मूर्ति धारण किए सुशोभित हो रहा हो॥241॥

Meaning :- Women are looking at him according to their own interest with joy in their hearts. As if the makeup itself is being adorned by wearing the most unique idol ॥241॥

चौपाई:

*बिदुषन्ह प्रभु बिराटमय दीसा। बहु मुख कर पग लोचन सीसा॥
जनक जाति अवलोकहिं कैसें। सजन सगे प्रिय लागहिं जैसें॥1॥

भावार्थ:-विद्वानों को प्रभु विराट रूप में दिखाई दिए, जिसके बहुत से मुँह, हाथ, पैर, नेत्र और सिर हैं। जनकजी के सजातीय (कुटुम्बी) प्रभु को किस तरह (कैसे प्रिय रूप में) देख रहे हैं, जैसे सगे सजन (संबंधी) प्रिय लगते हैं॥1॥

Meaning :- The Lord appeared to the scholars in a huge form, which has many mouths, hands, feet, eyes and heads. Janakji’s kindred (family) are looking at the Lord in what way (in what form of love), as the relatives (relatives) seem dear ॥1॥

Advertisements

*सहित बिदेह बिलोकहिं रानी। सिसु सम प्रीति न जाति बखानी॥
जोगिन्ह परम तत्वमय भासा। सांत सुद्ध सम सहज प्रकासा॥2॥

भावार्थ:-जनक समेत रानियाँ उन्हें अपने बच्चे के समान देख रही हैं, उनकी प्रीति का वर्णन नहीं किया जा सकता। योगियों को वे शांत, शुद्ध, सम और स्वतः प्रकाश परम तत्व के रूप में दिखे॥2॥

Meaning :- The queens including Janak are looking at him like their child, their love cannot be described. To the Yogis, He appeared as the supreme element, calm, pure, even and self-luminous ॥2॥

*हरिभगतन्ह देखे दोउ भ्राता। इष्टदेव इव सब सुख दाता॥
रामहि चितव भायँ जेहि सीया। सो सनेहु सुखु नहिं कथनीया॥3॥

भावार्थ:-हरि भक्तों ने दोनों भाइयों को सब सुखों के देने वाले इष्ट देव के समान देखा। सीताजी जिस भाव से श्री रामचन्द्रजी को देख रही हैं, वह स्नेह और सुख तो कहने में ही नहीं आता॥3॥

Meaning :- The devotees of Hari saw both the brothers as the bestower of all happiness. The affection and happiness with which Sitaji is looking at Shri Ramchandraji cannot even be said ॥3॥

Advertisements

*उर अनुभवति न कहि सक सोऊ। कवन प्रकार कहै कबि कोऊ॥
एहि बिधि रहा जाहि जस भाऊ। तेहिं तस देखेउ कोसलराऊ॥4॥

भावार्थ:-उस (स्नेह और सुख) का वे हृदय में अनुभव कर रही हैं, पर वे भी उसे कह नहीं सकतीं। फिर कोई कवि उसे किस प्रकार कह सकता है। इस प्रकार जिसका जैसा भाव था, उसने कोसलाधीश श्री रामचन्द्रजी को वैसा ही देखा॥4॥

Meaning :- She is experiencing that (affection and happiness) in her heart, but she also cannot say it. Then how can a poet call him In this way, whoever had the feeling, he saw Kosaladhish Shri Ramchandraji in the same way ॥4॥

दोहा:

*राजत राज समाज महुँ कोसलराज किसोर।
सुंदर स्यामल गौर तन बिस्व बिलोचन चोर॥242॥

भावार्थ:-सुंदर साँवले और गोरे शरीर वाले तथा विश्वभर के नेत्रों को चुराने वाले कोसलाधीश के कुमार राज समाज में (इस प्रकार) सुशोभित हो रहे हैं॥242॥

Meaning :- The Kumar Raj of Kosaladhish, who has a beautiful dark and fair body and steals the eyes of the world, is being decorated (in this way) in the society ॥242॥

Advertisements

चौपाई:

*सहज मनोहर मूरति दोऊ। कोटि काम उपमा लघु सोऊ॥
सरद चंद निंदक मुख नीके। नीरज नयन भावते जी के॥1॥

भावार्थ:-दोनों मूर्तियाँ स्वभाव से ही (बिना किसी बनाव-श्रृंगार के) मन को हरने वाली हैं। करोड़ों कामदेवों की उपमा भी उनके लिए तुच्छ है। उनके सुंदर मुख शरद् (पूर्णिमा) के चन्द्रमा की भी निंदा करने वाले (उसे नीचा दिखाने वाले) हैं और कमल के समान नेत्र मन को बहुत ही भाते हैं॥1॥

Meaning :- Both the idols are going to defeat the mind by nature (without any make-up). Even the simile of crores of Cupids is trivial for them. His beautiful face condemns even the moon of Sharad (full moon) and eyes like lotus are very pleasing to the mind ॥1॥

*चितवनि चारु मार मनु हरनी। भावति हृदय जाति नहिं बरनी॥
कल कपोल श्रुति कुंडल लोला। चिबुक अधर सुंदर मृदु बोला॥2॥

भावार्थ:-सुंदर चितवन (सारे संसार के मन को हरने वाले) कामदेव के भी मन को हरने वाली है। वह हृदय को बहुत ही प्यारी लगती है, पर उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। सुंदर गाल हैं, कानों में चंचल (झूमते हुए) कुंडल हैं। ठोड़ और अधर (होठ) सुंदर हैं, कोमल वाणी है॥2॥

Meaning :- Beautiful Chitvan (the one who defeats the mind of the whole world) is also going to defeat the mind of Kamdev. She is very dear to the heart, but it cannot be described. There are beautiful cheeks, there are playful (swinging) coils in the ears. Chin and Adhar (lips) are beautiful, soft speech ॥2॥

Advertisements

*कुमुदबंधु कर निंदक हाँसा। भृकुटी बिकट मनोहर नासा॥
भाल बिसाल तिलक झलकाहीं। कच बिलोकि अलि अवलि लजाहीं॥3॥

भावार्थ:-हँसी, चन्द्रमा की किरणों का तिरस्कार करने वाली है। भौंहें टेढ़ी और नासिका मनोहर है। (ऊँचे) चौड़े ललाट पर तिलक झलक रहे हैं (दीप्तिमान हो रहे हैं)। (काले घुँघराले) बालों को देखकर भौंरों की पंक्तियाँ भी लजा जाती हैं॥3॥

Meaning :- Laughter is the one who despises the rays of the moon. The eyebrows are crooked and the nostrils are graceful. On the (high) broad forehead the tilak is shining (becoming radiant). Seeing the (black curly) hair, even the rows of bumblebees are ashamed ॥3॥

*पीत चौतनीं सिरन्हि सुहाईं। कुसुम कलीं बिच बीच बनाईं॥
रेखें रुचिर कंबु कल गीवाँ। जनु त्रिभुवन सुषमा की सीवाँ॥4॥

भावार्थ:-पीली चौकोनी टोपियाँ सिरों पर सुशोभित हैं, जिनके बीच-बीच में फूलों की कलियाँ बनाई (काढ़ी) हुई हैं। शंख के समान सुंदर (गोल) गले में मनोहर तीन रेखाएँ हैं, जो मानो तीनों लोकों की सुंदरता की सीमा (को बता रही) हैं॥4॥

Meaning :- Yellow square caps are decorated on the ends, in between which flower buds have been made (Kadhi). Beautiful (round) like a conch, there are three beautiful lines in the neck, which seem to be (telling) the limits of the beauty of the three worlds ॥4॥

Advertisements

दोहा:

*कुंजर मनि कंठा कलित उरन्हि तुलसिका माल।
बृषभ कंध केहरि ठवनि बल निधि बाहु बिसाल॥243॥

भावार्थ:-हृदयों पर गजमुक्ताओं के सुंदर कंठे और तुलसी की मालाएँ सुशोभित हैं। उनके कंधे बैलों के कंधे की तरह (ऊँचे तथा पुष्ट) हैं, ऐंड़ (खड़े होने की शान) सिंह की सी है और भुजाएँ विशाल एवं बल की भंडार हैं॥243॥

Meaning :- The hearts are adorned with the beautiful shoulders of Gajmukta and garlands of Tulsi. His shoulders are like the shoulders of bullocks (high and strong), the back (pride of standing) is like that of a lion and the arms are huge and store of strength ॥243॥

चौपाई:

*कटि तूनीर पीत पट बाँधें। कर सर धनुष बाम बर काँधें॥
पीत जग्य उपबीत सुहाए। नख सिख मंजु महाछबि छाए॥1॥

भावार्थ:-कमर में तरकस और पीताम्बर बाँधे हैं। (दाहिने) हाथों में बाण और बाएँ सुंदर कंधों पर धनुष तथा पीले यज्ञोपवीत (जनेऊ) सुशोभित हैं। नख से लेकर शिखा तक सब अंग सुंदर हैं, उन पर महान शोभा छाई हुई है॥1॥

Meaning :- Tarkas and Pitambar are tied around the waist. Arrows in the (right) hands and bow and yellow sacrificial beads (Janeu) on the left beautiful shoulders. All the parts are beautiful from the fingernail to the tip of the head, they have great beauty ॥1॥

Advertisements

*देखि लोग सब भए सुखारे। एकटक लोचन चलत न तारे॥
हरषे जनकु देखि दोउ भाई। मुनि पद कमल गहे तब जाई॥2॥

भावार्थ:-उन्हें देखकर सब लोग सुखी हुए। नेत्र एकटक (निमेष शून्य) हैं और तारे (पुतलियाँ) भी नहीं चलते। जनकजी दोनों भाइयों को देखकर हर्षित हुए। तब उन्होंने जाकर मुनि के चरण कमल पकड़ लिए॥2॥

Meaning :- Everyone was happy to see him. The eyes are fixed (nimesh zero) and even the stars (pupils) do not move. Janakji was happy to see both the brothers. Then he went and held the lotus feet of the sage ॥2॥

*करि बिनती निज कथा सुनाई। रंग अवनि सब मुनिहि देखाई॥
जहँ जहँ जाहिं कुअँर बर दोऊ। तहँ तहँ चकित चितव सबु कोऊ॥3॥

भावार्थ:-विनती करके अपनी कथा सुनाई और मुनि को सारी रंगभूमि (यज्ञशाला) दिखलाई। (मुनि के साथ) दोनों श्रेष्ठ राजकुमार जहाँ-जहाँ जाते हैं, वहाँ-वहाँ सब कोई आश्चर्यचकित हो देखने लगते हैं॥3॥

Meaning :- After requesting, narrated his story and showed the entire amphitheater (Yagyashala) to the sage. (Accompanied by sage) Wherever both the best princes go, everyone starts watching with astonishment ॥3॥

Advertisements

*निज निज रुख रामहि सबु देखा। कोउ न जान कछु मरमु बिसेषा॥
भलि रचना मुनि नृप सन कहेऊ। राजाँ मुदित महासुख लहेऊ॥4॥

भावार्थ:-सबने रामजी को अपनी-अपनी ओर ही मुख किए हुए देखा, परन्तु इसका कुछ भी विशेष रहस्य कोई नहीं जान सका। मुनि ने राजा से कहा- रंगभूमि की रचना बड़ी सुंदर है (विश्वामित्र- जैसे निःस्पृह, विरक्त और ज्ञानी मुनि से रचना की प्रशंसा सुनकर) राजा प्रसन्न हुए और उन्हें बड़ा सुख मिला॥4॥

Meaning :- Everyone saw Ramji facing towards himself, but no one could know any special secret of this. The sage said to the king- The composition of the stage is very beautiful (Vishwamitra-like a disinterested, disinterested and knowledgeable sage listening to the praise of the composition) The king was pleased and he got great pleasure ॥4॥

दोहा:

*सब मंचन्ह तें मंचु एक सुंदर बिसद बिसाल।
मुनि समेत दोउ बंधु तहँ बैठारे महिपाल॥244॥

भावार्थ:-सब मंचों से एक मंच अधिक सुंदर, उज्ज्वल और विशाल था। (स्वयं) राजा ने मुनि सहित दोनों भाइयों को उस पर बैठाया॥244॥

Meaning :- One platform was more beautiful, bright and spacious than all the platforms. (himself) the king made both the brothers along with the sage sit on it ॥244॥

Advertisements

चौपाई:

*प्रभुहि देखि सब नृप हियँ हारे। जनु राकेश उदय भएँ तारे॥
असि प्रतीति सब के मन माहीं। राम चाप तोरब सक नाहीं॥1॥

भावार्थ:- प्रभु को देखकर सब राजा हृदय में ऐसे हार गए (निराश एवं उत्साहहीन हो गए) जैसे पूर्ण चन्द्रमा के उदय होने पर तारे प्रकाशहीन हो जाते हैं। (उनके तेज को देखकर) सबके मन में ऐसा विश्वास हो गया कि रामचन्द्रजी ही धनुष को तोड़ेंगे, इसमें संदेह नहीं॥1॥

Meaning :- Seeing the Lord, all the kings lost their heart (became disheartened and disheartened) like the stars become lightless when the full moon rises. (Seeing his glory) there was such a belief in everyone’s mind that only Ramchandraji would break the bow, there is no doubt about it ॥1॥

*बिनु भंजेहुँ भव धनुषु बिसाला। मेलिहि सीय राम उर माला॥
अस बिचारि गवनहु घर भाई। जसु प्रतापु बलु तेजु गवाँई॥2॥

भावार्थ:-(इधर उनके रूप को देखकर सबके मन में यह निश्चय हो गया कि) शिवजी के विशाल धनुष को (जो संभव है न टूट सके) बिना तोड़े भी सीताजी श्री रामचन्द्रजी के ही गले में जयमाला डालेंगी (अर्थात दोनों तरह से ही हमारी हार होगी और विजय रामचन्द्रजी के हाथ रहेगी)। (यों सोचकर वे कहने लगे) हे भाई! ऐसा विचारकर यश, प्रताप, बल और तेज गँवाकर अपने-अपने घर चलो॥2॥

Meaning :-(Here, seeing her form, it was decided in everyone’s mind that) even without breaking the huge bow of Shivji (which is possible cannot be broken), Sitaji will garland Shri Ramchandraji’s neck only (i.e. in both ways our There will be defeat and victory will be in the hands of Ramchandraji). (Thinking like this they started saying) Hey brother! Thinking like this, losing fame, glory, strength and glory, go to your respective homes ॥2॥

Advertisements

*बिहसे अपर भूप सुनि बानी। जे अबिबेक अंध अभिमानी॥
तोरेहुँ धनुषु ब्याहु अवगाहा। बिनु तोरें को कुअँरि बिआहा॥3॥

भावार्थ:-दूसरे राजा, जो अविवेक से अंधे हो रहे थे और अभिमानी थे, यह बात सुनकर बहुत हँसे। (उन्होंने कहा) धनुष तोड़ने पर भी विवाह होना कठिन है (अर्थात सहज ही में हम जानकी को हाथ से जाने नहीं देंगे), फिर बिना तोड़े तो राजकुमारी को ब्याह ही कौन सकता है॥3॥

Meaning :- The other king, who was going blind due to indiscretion and was arrogant, laughed a lot after hearing this. (He said) It is difficult to get married even after breaking the bow (that is, we will not let Janaki go out of hand easily), then who can marry a princess without breaking it ॥3॥

*एक बार कालउ किन होऊ। सिय हित समर जितब हम सोऊ॥
यह सुनि अवर महिप मुसुकाने। धरमसील हरिभगत सयाने॥4॥

भावार्थ:-काल ही क्यों न हो, एक बार तो सीता के लिए उसे भी हम युद्ध में जीत लेंगे। यह घमंड की बात सुनकर दूसरे राजा, जो धर्मात्मा, हरिभक्त और सयाने थे, मुस्कुराए॥4॥

Meaning :- No matter what the death, at least once for the sake of Sita, we will win that too in the war. Hearing this boasting, the other king, who was pious, devotee of Hari and wise, smiled ॥4॥

Advertisements


सोरठा:

*सीय बिआहबि राम गरब दूरि करि नृपन्ह के।
जीति को सक संग्राम दसरथ के रन बाँकुरे॥245॥

भावार्थ:-(उन्होंने कहा-) राजाओं के गर्व दूर करके (जो धनुष किसी से नहीं टूट सकेगा उसे तोड़कर) श्री रामचन्द्रजी सीताजी को ब्याहेंगे। (रही युद्ध की बात, सो) महाराज दशरथ के रण में बाँके पुत्रों को युद्ध में तो जीत ही कौन सकता है॥245॥

Meaning :-(He said-) By removing the pride of the kings (by breaking the bow which cannot be broken by anyone) Shri Ramchandraji will marry Sitaji. (Regarding the war, so) Who can win the remaining sons in the battle of Maharaj Dashrath in the war ॥245॥

चौपाई:

*ब्यर्थ मरहु जनि गाल बजाई। मन मोदकन्हि कि भूख बुताई॥
सिख हमारि सुनि परम पुनीता। जगदंबा जानहु जियँ सीता॥1॥

भावार्थ:-गाल बजाकर व्यर्थ ही मत मरो। मन के लड्डुओं से भी कहीं भूख बुझती है? हमारी परम पवित्र (निष्कपट) सीख को सुनकर सीताजी को अपने जी में साक्षात जगज्जननी समझो (उन्हें पत्नी रूप में पाने की आशा एवं लालसा छोड़ दो),॥1॥

Meaning :- Don’t die in vain by playing cheek. Does the hunger get quenched even with the laddoos of the mind? After listening to our most sacred (honest) teaching, consider Sitaji as the real world in your heart (leave the hope and longing to have her as your wife), ॥1॥

Advertisements

*जगत पिता रघुपतिहि बिचारी। भरि लोचन छबि लेहु निहारी॥
सुंदर सुखद सकल गुन रासी। ए दोउ बंधु संभु उर बासी॥2॥

भावार्थ:-और श्री रघुनाथजी को जगत का पिता (परमेश्वर) विचार कर, नेत्र भरकर उनकी छबि देख लो (ऐसा अवसर बार-बार नहीं मिलेगा)। सुंदर, सुख देने वाले और समस्त गुणों की राशि ये दोनों भाई शिवजी के हृदय में बसने वाले हैं (स्वयं शिवजी भी जिन्हें सदा हृदय में छिपाए रखते हैं, वे तुम्हारे नेत्रों के सामने आ गए हैं)॥2॥

Meaning :- And considering Shri Raghunathji as the Father (God) of the world, look at his image with full eyes (you will not get such an opportunity again and again). Beautiful, giving happiness and the sum of all the qualities, these two brothers are going to reside in the heart of Shivji (even Shivji himself who always keeps hidden in the heart, has come in front of your eyes) ॥2॥

*सुधा समुद्र समीप बिहाई। मृगजलु निरखि मरहु कत धाई॥
करहु जाइ जा कहुँ जोइ भावा। हम तौ आजु जनम फलु पावा॥3॥

भावार्थ:-समीप आए हुए (भगवत्‍दर्शन रूप) अमृत के समुद्र को छोड़कर तुम (जगज्जननी जानकी को पत्नी रूप में पाने की दुराशा रूप मिथ्या) मृगजल को देखकर दौड़कर क्यों मरते हो? फिर (भाई!) जिसको जो अच्छा लगे, वही जाकर करो। हमने तो (श्री रामचन्द्रजी के दर्शन करके) आज जन्म लेने का फल पा लिया (जीवन और जन्म को सफल कर लिया)॥3॥

Meaning :- Leaving the ocean of nectar that came near (Bhagwatdarshan form) why do you (false form of desire to get Jagajjanani Janaki as wife) run and die seeing the mirage? Then (brother!) go and do whatever you like. We have got the fruit of our birth today (by seeing Shri Ramchandraji) (made life and birth successful) ॥3॥

Advertisements

*अस कहि भले भूप अनुरागे। रूप अनूप बिलोकन लागे॥
देखहिं सुर नभ चढ़े बिमाना। बरषहिं सुमन करहिं कल गाना॥4॥

भावार्थ:-ऐसा कहकर अच्छे राजा प्रेम मग्न होकर श्री रामजी का अनुपम रूप देखने लगे। (मनुष्यों की तो बात ही क्या) देवता लोग भी आकाश से विमानों पर चढ़े हुए दर्शन कर रहे हैं और सुंदर गान करते हुए फूल बरसा रहे हैं॥4॥

Meaning :- By saying this, the good king started seeing the unique form of Shri Ramji, being engrossed in love. (What to talk about human beings) Even the deities are having darshan from the sky mounted on planes and showering flowers while singing beautiful songs ॥4॥

One-Time
Monthly
Yearly

Make a one-time donation

Make a monthly donation

Make a yearly donation

Choose an amount

$5.00
$15.00
$100.00
$5.00
$15.00
$100.00
$5.00
$15.00
$100.00

Or enter a custom amount

$

Your contribution is appreciated.

Your contribution is appreciated.

Your contribution is appreciated.

DonateDonate monthlyDonate yearly

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s